बड़ी ही तंग रातें हैं, इन्हीं दिनों की बात है। जब बेबसी ही तौर है, और मुफलिसी का दौर है। कहतें है एक वक़्त है, अंधेरी बारिशों की भी, खिल उठेगी जिंदगी में, धूप कोई संदली सी। यही सोच के अबके सफ़र, चल यूँही तन्हा चल पड़ें। उछल के कुछ रंगी सितारे, ख़ुद ही चुन अँखियों जड़ें। इक ख्वाबदारी गर न होगी, जिस्म होगा,रूह न होगी। आ के अब हम ख़्वाबदाँ हों, जिंदगी के क़दरदाँ हों। आ जा, ख़ुदी को आज, हम जी भर गले लगा बैठें। चाँद तकते ख़्वाबदाँ बन, गीत गाएं, और खो बैठें। आशिक़ हों,दिल-वाले हों, अब हम भी किस्मतवाले हों। इश्क़ मुहब्बत ख़ूब करें हम, आ रब को भी महबूब करें हम।
ख्वाबदारी
© Tushar Pandey · काव्यपथ
