ऑफिस में किसी ने नाश्ते का डब्बा मंगवाया था। देर से नाश्ता मिलने पर एकसाथ ढोकला, समोसा पर धधककर टूटते हुए ये एहसास हुआ कि शायद भूख का स्वाद सबसे निराला होता है। काफी तसल्लीबख्श ठंडे समोसे खाने के बाद भी उसी का स्वाद मुंह में गूंजता रहा। समोसा देखने में ठीक ठाक था। तीनों किनारे एक दूसरे से मिलने के लिए चल पड़े थे, बीच में आलू भरा एक स्थूल विस्तार।
सोचते सोचते बोल ही पड़ा, "अरे! समोसा काफ़ी बढ़िया था।"
ऐसे मौकों पर असुरक्षा का मोम चढ़ा होता है मन पर, लेकिन अनुभव की ऊष्मा के आगे, इसकी एक नहीं चलती।
“हां! हां! अच्छा था।” दो तीन स्वर एक साथ फूट पड़े। डब्बे पर से झट से नाम पढ़कर अगली बार यहीं से समोसे मंगाने के सपने बुन लिए गए।
समोसा बीस का हो गया है। मेरी पहली स्मृति में समोसा एक रुपये का था। ये एक बहुत ही अच्छी बात थी कि समोसा एक रुपये का था। हिसाब किताब का कोई झंझट नहीं। पांच समोसों के हुए — पांच रुपए। मैं खुशनसीब, एक का पहाड़ा मुझे अनंत तक आता था। जिन बच्चों को समोसा सात रुपए का मिला होगा, उनके तो पसीने छूट जाते होंगे। सात अट्ठे कितना होता है? छोड़िए!
बीच गांव के तिराहे पर छोटी-छोटी दो, तीन दुकानें थी। ऐसे ही एक दुकान की छत पर, एक दीदी दो बजे (लोकभाषा मे दोपहर के थोड़े बाद और शाम के थोड़े पहले वाले समय को ऊपरी बेला कहा जाता था, मैने इसका समय दो बजे तय किया था); विषयांतर होने का जी कर रहा—
*[शीनू, मेरी छोटी कजिन एक बार बचपन में दौड़ी हुई मेरे पास आयी और कहा, भैया! मुझे घड़ी देखने आ गया। दीवार घड़ी की ओर नजरें घुमाते हुए मैने पूछा, अच्छा बताओ! कितने बजे हैं? *
*“दो!” तपाक से बोल पड़ी। *
उसके बाद कई शाम, कई सुबह मैं जब भी उसे कूदते फांदते देखता, पूछ पड़ता, “अजी! जरा बताओ तो, कितने बजे हैं मुझे बहुत काम है।”
वो हर बार बताती , “दो!” ]
खैर, ठीक दो बजे वो दीदी, लोहे की काली कड़ाही जिसके दोनों कान असमान और कुछ ऊटपटांग आकृति के थे, कपड़ों के सहारे मिट्टी के चूल्हे की धधकती आग पर चढ़ा देतीं। बगल में एक बड़े से बर्तन में, नाज़ुक पर सीधे तने हुए छोटे-छोटे समोसे ऐसे बैठे होते जैसे तेल में तैरने को बे-ताब हों। मैं बड़ी तन्मयता से मुट्ठी में पांच रुपए या दस रुपए का नोट दबाए ये सब देखते रहता। जब तक दीदी फूंक मार के चूल्हा जलाती तब तक मैं उस नोट पर बनी आकृतियों, शब्दों को कई बार देख पढ़ डालता।
खौलते तेल में पड़ते हीं, समोसे अपना जादू दिखाना शुरू कर देते। हवा में एक खुशनुमा खुशबू तैर जाती। समोसे मिलते हीं, मैं गीत गाते घर की ओर भाग पड़ता।
लगभग बीस साल पहले की बात है यह। उसके बाद मजाल है कि कहीं और के समोसों ने मेरा दिल जीता हो। मेरे लिए गाँव के उस समोसे का प्यार, छठी कक्षा में स्कूल में मिली ‘उसकी’ नजर जैसी है, जिनका चहकना देख मैंने स्कूली अंताक्षरी के कई शनिवार बॉलीवुडिया प्रेम गीत गाए थे।
दोनों की वजह एक ही थी — सादगी।
मैदे में थोड़ी कलेंजी, और अंदर का आलू जीरे में हल्का फ़्राय किया हुआ। बस इतना ही। ये बात दिल्ली के हर कोने में उपजे अग्रवाल स्वीट्स वालों को किसी ने नहीं बताई कि, बिना मूंगफली, बिना पनीर, बिना मटर, बिना धनिया, बिना चना, [बिना स्नैपड्रैगन प्रोसेसर, बिना फिंगर प्रिंट स्कैनर, बिना टेलीफोटो लेंस, बिना गोला, बिना बारूद, बिना पेट्रोल, बिना ई स्कूटर, बिना फलाना, बिना ढिमकाना, ईचक दाना बीचक दाना दाने ऊपर दाना ईचक दाना] भी अच्छा, खाने योग्य, स्वादिष्ट समोसा बनाया जा सकता है।
गांव के बाद बनारस में बिताए आठों बरस, लौंगलते के तुरत बाद खाए जा सकने वाले ठिगने समोसे भी मुझे खूब भाते थे; रथयात्रा से कोल्हुआ की ओर जाने पर रास्ते में एक कोने पर समोसो और लॉन्गलत्तों की एक छोटी दुकान थी। पत्ते के दोनों पर ये गरम गरम दो समोसे और चटनी। इस बात की बड़ी असमंजसता होती थी कि पहले समोसे खाए जाएं, या लौंगलता। बनारस में ही स्कूल के कैंटीन में, लंच ब्रेक से पहले ही भीड़ जमा हो जाती, बबलू भैया के समोसे ढाई रुपए के एक मिलते थे। पूरे वातावरण में बबलू भैया एक! बबलू भैया दो! गुंजयमान रहता।
अक्सर समोसा खाने में जल्दबाजी की वजह से मुंह की ऊपर की छत सिक जाती है। फिर निवाले को मुंह में हु हु हा हा करके हवा देने की कोशिशें करनी पड़ती हैं। दर्जनों बार मुंह जलाने के बाद ये तालीम मिली है कि कढ़ाई में से तुरंत निकले समोसे को थोड़ी देर तक निहारते रहने में ही भलाई है। फिर थोड़ी देर बाद कान मरोड़कर तोड़ दीजिए। और जब भाप थोड़ा तितर बितर हो जाए, फिर एक गहरी सांस लेकर टूट पड़िए।
मुझे याद है, यहां पहली बार किसी दुकान पर समोसा मांगा था, तो पाव में डालकर दे दिया गया था। समोसे की इस दुर्गति से मुझे हंसी आ गई थी। इसलिए अभी परसों ऑफिस में, मुंबई के किसी दुकान के समोसे का पसंद आ जाना मेरे लिए एक हैरतअंगेज घटना थी।
खैर! समोसे से मेदे पर जोर पड़ने का डर नहीं होता, तो कमबख्त हर रोज खाया जा सकता था। तीस का होने चला हूँ। अब वैसा बचपना और वैसी जठराग्नि नहीं की अपने समोसे झटपट ख़त्म करके, भाई बहनों के आगे हाथ फैला, मांगकर उनके भी समोसे चट कर दिए जाएं।
(समाप्त)
