बे-नियाज़ी
इख़्तियार हो तो मैं कुछ ज़िक्र भी किया करूँ
चार दिन की ज़िंदगी इस पे क्यों गुमाँ करूँ..
है कहाँ वो शख़्स जो गाता था नग़्मे इश्क़ के
दफ़्न है मुझमें वो पर ये राज़ क्यों बयाँ करूँ..
होंगे मेरे बाद भी लाखों सुख़न-वर हुस्न के
नाज़नीनों पर भला फ़िर लफ़्ज़ क्यों ज़ियाँ करूँ..
छोड़ दें तन्हा अगर मुझको वफ़ा की चाहतें
चाहतों से फिर बता मैं क्यों कोई वफ़ा करूँ..
ढूँढता फिरता रहा जिसको बुतों में आदतन
पा लूँ वो महबूब गर, फिर क्यों भला सजदा करूँ..
***
इख़्तियार: Control/Power
ज़िक्र: Mention
गुमाँ: Arrogance/Illusion
तन्हा: Lonely/Alone
वफ़ा: Loyalty/Faithfulness
सुख़न-वर: Poets/Eloquent speakers
नाज़नीन: Beauties
ज़ियाँ: Waste/Loss
बुतों: Idols
महबूब: Beloved
सजदा: Prostration/Bowing down
नग़्मे: Songs
दफ़्न: Buried
बयाँ: Reveal/Express
