विशेष संग्रह

अध्यात्म और रूहानी सफर

मन और आत्मा की यात्रा · 12 रचनाएँ

04

आत्‍मावलोकन

दिन के हिस्से जो रवि है देवताओं की छवि है काश ख़ुद का सूर्य होता रजनी को उपहार देता.. "हटा के बेड़ियां भीतर के मन की करूं स्वीकार मैं आखेट व…

05

रणभेरी

मन बल हो शिथिल लगे मार्ग जटिल कभी नीरस कोई लम्हा हो मन चीख उठे 'तुम तन्हा हो!' ये चीख कभी रुकने न दो पलकें अपनी झुकने न दो हो अंधियारा कितना…

13

सब कुछ अपना

लक्ष्य निकट पर मार्ग कठिन हो क्षितिज दिखे पर सूर्य मलिन हो मन की शक्ति जब भी तेरी थोड़ी धुंधली होने आए उम्मीदों की ज्वाला को संशय का अंधियार…

15

सांख्य योग

जीत हार का दंश, नहीं विचलित करता जिस नर को, तन, मन, धन सर्वस्व होम कर, फिरता निर्भीक समर को। मिथ्याओं के बीच बात जो सत्य शील की करता है, षड्…

17

एक कतरा सुख

कुछ बिखरा होगा बरसों पहले कोई चोट आई होगी दिल पर एक गहरा संताप या फिर बहुत थोड़ी मामूली सी बेचैनी, न जाने क्यों पसरी रहती है इनकी कालिमा जैस…

19

स्पर्श

सोचो वे बड़े सुभागे होंगे! कितनी रातों को जागे होंगे! परस्पर्श नहीं जिनके जीवन, क्या गीत प्रेम के गाते होंगे? कुहक कुहक कोमल केकी, जब राग मी…

30

ईप्सा

दुनियावी ढोल मंजीरों के बीच, ओझल होतीं मेरी रवहीन सांसे। उचकता, उछलता और नाचता मैं — बेसुरा, एक अदना आदम। गीत बुनने की ईप्सा में, थकता-बुझता…

32

प्रेम सुधा साँचा रस है

स्वार्थ, द्वेष की फांस लिए, सब का, अपना ढेरा है। चाहे बंधु, सखा, कुल छूटे, कहते, ये मेरा, वो तेरा है! फिर शुष्क पड़े कुछ आंखों के, आतप जलते …

43

मौन की देहरी पर

रात के हल्के धुंधलके में सैकड़ों बिसरी हुई दास्तानों ने एक साथ दस्तक दे दी है। नीले आसमान की रगों में कालिमा पसरती हुई दिख रही है। आसमान से …

45

पुरुषत्व

अश्रांत कौंधती अग्नि हृदय, वाणी गरजे सर्वत्र, निर्भय। थाह क्षुधा का ज्ञात नहीं, ये कैसी माया? ज्ञात नहीं। जिह्वा से ज्वाला बहती है, नथुनों म…

44

ख्वाबदारी

बड़ी ही तंग रातें हैं, इन्हीं दिनों की बात है। जब बेबसी ही तौर है, और मुफलिसी का दौर है। कहतें है एक वक़्त है, अंधेरी बारिशों की भी, खिल उठे…

47

बे-नियाज़ी

इख़्तियार हो तो मैं कुछ ज़िक्र भी किया करूँ चार दिन की ज़िंदगी इस पे क्यों गुमाँ करूँ.. है कहाँ वो शख़्स जो गाता था नग़्मे इश्क़ के दफ़्न है …