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कविता

26 रचनाएँ

46

जागि जागि चौखट निहारूँ

✤ ❊ ✤ ❊ ✤ ❊ ✤ ❊ ✤ ❊ ✤ ❊ ✤ जागि जागि चौखट निहारूँ पिया जी, अँखियाँ मोरी मतवारी रहत है। उठि उठि भागूं मैं जमुना किनारे, दरसन आस तिहारी रहत है।…

45

पुरुषत्व

अश्रांत कौंधती अग्नि हृदय, वाणी गरजे सर्वत्र, निर्भय। थाह क्षुधा का ज्ञात नहीं, ये कैसी माया? ज्ञात नहीं। जिह्वा से ज्वाला बहती है, नथुनों म…

42

रेलगाड़ी

चाँदनी रात है, दूधिया रोशनी से नहाए खेतों के बीचोंबीच एक रेलगाड़ी सरपट भागती जा रही है। गांवों, शहरों और कस्बों की टिमटिमाती बत्तियों से सजे…

38

साँझ भई औ कान्हा, दरसन ना दियौ आय

**साँझ भई औ कान्हा, दरसन ना दियौ आय, बालक बिलखें भूख सों, चूल्हो न जरयौ हाय। सुनु मैया जसुमति, आइ जाउ द्वार पै, पकड़ि हाथ मोहन कौ, जियरा अकु…

37

प्रेम गीत गाए

भाग की पटखनी से पैर डगमगाए फ़िर भी मुस्कुराए, हाय! प्रेम गीत गाए जिद्दी मनवा धूल झाड़ फिर उठ जाए। मोह माया जाने बूझे फ़िर भी इसे इश्क़ सूझे …

36

चाँद

वह कहती— चाँद हो तुम। सैंकड़ों मौन रस्ते, गीत गाते, मेरे खिलखिलाते चाँद। तन्हा तपती रातों में, मेरे संग जगते, दिल लुभाते चाँद। तुम्हें मैं घ…

32

प्रेम सुधा साँचा रस है

स्वार्थ, द्वेष की फांस लिए, सब का, अपना ढेरा है। चाहे बंधु, सखा, कुल छूटे, कहते, ये मेरा, वो तेरा है! फिर शुष्क पड़े कुछ आंखों के, आतप जलते …

31

इश्क़ में होना

इश्क़ में होना, सैंकड़ों इंद्रधनुषों से, लबालब भर जाना होता है। और होता है, आंखों में, चांद लिए इतने हौले देखना, कि नजर ना चुभे कहीं। केवल पस…

30

ईप्सा

दुनियावी ढोल मंजीरों के बीच, ओझल होतीं मेरी रवहीन सांसे। उचकता, उछलता और नाचता मैं — बेसुरा, एक अदना आदम। गीत बुनने की ईप्सा में, थकता-बुझता…

29

तोहरे बिना सब सून

सजना...तोहरे बिना सब सून सजना...तोहरे बिना सब सून तोहरे बिना सब सून चंदा मोरा, बदन जलाए चंदा मोरा, बदन जलाए तुम बिन तरसे मोरा जिया सजना...तो…

28

पूस मास बीति गयउ बाग बन जागि उठें

**पूस मास बीति गयउ बाग बन जागि उठें, काकलीख बांचहिं बैठि बात आपन चीति की। मीठि बयरिया में सुलगै अँकोरि मोरि, निष्ठुर बसंत आयउ कहुँ टोह नहिं …

27

अधूरा लिखूंगा

लिखने चलूं गर तुम्हारा ये चेहरा पहले कहूंगा कि सुंदर है चेहरा फ़िर थोड़ी और कोशिश करूं तो लिखूंगा कि कैसे तुम्हारी एक नज़र मुझे छू जाती है—ऐ…

24

प्यार मेरे

फेरो नज़र मेरी तरफ़ ऐ यार मेरे इस बेरुखी की अब नहीं दरकार तेरे इक चांद जो अटका हुआ मेरे फलक पर छूकर उसे, ढलने दो अब सरकार मेरे देखो जरा, कुछ…

21

मयरिया

कातिक महिनवा मे सूरूज ठंडइलें लागल भोरे बहे शीतली बयरिया निमिया पर बईठल, चिरईया भी गावे एही मासे अइहें रे हमरो मयरिया काल्हे दुपहरिया में का…

20

उलफ़त

ये अजब गज़ब के वादे कि ले आऊं तोड़ सितारे मैं? पुर-ज़ोर चमकना चेहरा उसका जैसे ले ही आया सारे मैं पहलू में बैठे मेरे यूं बहकी बातें कर जाती व…

19

स्पर्श

सोचो वे बड़े सुभागे होंगे! कितनी रातों को जागे होंगे! परस्पर्श नहीं जिनके जीवन, क्या गीत प्रेम के गाते होंगे? कुहक कुहक कोमल केकी, जब राग मी…

18

पूजन

प्रेमिकाएं अभिनत थीं उन्होंने उन्मुक्त कंठ से स्तुति की, गीत गाए उनके स्वामित्व और अपेक्षाओं ने चीख चीखकर रिक्त विज्ञप्त किया। जब भी गईं तोड…

17

एक कतरा सुख

कुछ बिखरा होगा बरसों पहले कोई चोट आई होगी दिल पर एक गहरा संताप या फिर बहुत थोड़ी मामूली सी बेचैनी, न जाने क्यों पसरी रहती है इनकी कालिमा जैस…

16

इसक

मैं इधर देखूं या उधर देखूं वो ही नज़र आए जिधर देखूं इसक की रंग का गहरा असर है न कोई ग़म, न कोई फ़िकर है ज़माना सुर्ख आंखे लाल लेकर कंटीले कायद…

15

सांख्य योग

जीत हार का दंश, नहीं विचलित करता जिस नर को, तन, मन, धन सर्वस्व होम कर, फिरता निर्भीक समर को। मिथ्याओं के बीच बात जो सत्य शील की करता है, षड्…

13

सब कुछ अपना

लक्ष्य निकट पर मार्ग कठिन हो क्षितिज दिखे पर सूर्य मलिन हो मन की शक्ति जब भी तेरी थोड़ी धुंधली होने आए उम्मीदों की ज्वाला को संशय का अंधियार…

12

व्हाइट नाइट्स

"सपनो में डूबा मैं हकीकी दुनिया से अनजान मुझे समेटने दो वो रुका हुआ चांद "ये बरबस गिरते दरियादिल बेचारे आंसू मत रोको इन्हे इनकी चोट से कोई घ…

11

खुशगवार शाम

उठती बैठती मूक सांसे। तेज गिरती बारिश से धुलकर, और चटख होती, इक धुंधली-सी याद! होठों के नीचे एक नन्हा सा तिल। उसकी डूबती नजरों में गोते खाता…

09

अलेक्जेंड्रिया

अलस-सुब्ह गिरती-रुकती दुविधापूर्ण बारिश ढीठ दिहाड़ी मजदूर गड्ढों से बचते भागते लोग उधर बेपरवाह थोड़ी मदमत्त सबको हिकारत से ताकती स्कूटर की म…

05

रणभेरी

मन बल हो शिथिल लगे मार्ग जटिल कभी नीरस कोई लम्हा हो मन चीख उठे 'तुम तन्हा हो!' ये चीख कभी रुकने न दो पलकें अपनी झुकने न दो हो अंधियारा कितना…

04

आत्‍मावलोकन

दिन के हिस्से जो रवि है देवताओं की छवि है काश ख़ुद का सूर्य होता रजनी को उपहार देता.. "हटा के बेड़ियां भीतर के मन की करूं स्वीकार मैं आखेट व…