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गज़ल
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इख़्तियार
इख़्तियार हो तो मैं कुछ ज़िक्र भी किया करूँ चार दिन की ज़िंदगी इस पे क्यों गुमाँ करूँ.. है कहाँ वो शख़्स जो गाता था नग़्मे इश्क़ के दफ़्न है …
ख्वाबदारी
बड़ी ही तंग रातें हैं, इन्हीं दिनों की बात है। जब बेबसी ही तौर है, और मुफलिसी का दौर है। कहतें है एक वक़्त है, अंधेरी बारिशों की भी, खिल उठे…